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9789388183833 6422bd0cd6b8b60283311923 Pratinidhi Kahaniyan : Shani https://www.bookishsanta.com/s/63fe03d26a1181c480898883/6422bd0dd6b8b60283311969/book-rajkamal-prakashan-9789388183833-19164853174438.jpg
शानी हिन्दी साहित्य के एक विरल कथाकार हैं। अनछुए-अनदेखे यथार्थ को एक बड़े कैनवस पर रचने के लिए शानी के पास जो विज़न था, वह विघटन के इस दौर में आज भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। उसे प्रस्तुत संग्रह की इन प्रतिनिधि कहानियों में भी सा$फ देखा जा सकता है। इसमें एक तर$फ उन्होंने ‘जनाज़ा’, ‘युद्ध’, ‘जली हुई रस्सी’ सरीखी रचनाओं के ज़रिये, विभाजन के बाद से अपने में बन्द मुस्लिम समाज के बहुत सारे डर, असमंजस और विरोधाभास हमारे सामने रखे हैं, तो दूसरी ओर ‘जहाँपनाह जंगल’ जैसी दुनिया उद्घाटित की है और ‘परस्त्रीगमन’ जैसा नज़रिया पेश किया है। उनकी कहानियों में हमें अपने भीतर की वह दबी हुई ची$ख सुनाई पड़ती है, जिसे हम रोज़ मुल्तवी करते चलते थे। साथ ही, उनकी दूरबीनी नज़र के सामने हम अपने कार्यकलापों को बौना, br>व्यर्थ और क्षणभंगुर होता हुआ भी पाते हैं। संक्षेप में, उनके पाठकों को कहीं छुटकारा नहीं है—हर हालत में वे पात्रों की नियति के सहभोगी हैं—उसमें विद्रूप हो, व्यंग्य हो या कभी न भुलाया जानेवाला अपमान। शानी के रचना-संसार से अपरिचित पाठकों के लिए यह संकलन य$कीनन प्रतिनिधि सिद्ध होगा।.

9789388183833
in stock INR 156
Rajkamal Prakashan
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शानी हिन्दी साहित्य के एक विरल कथाकार हैं। अनछुए-अनदेखे यथार्थ को एक बड़े कैनवस पर रचने के लिए शानी के पास जो विज़न था, वह विघटन के इस दौर में आज भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। उसे प्रस्तुत संग्रह की इन प्रतिनिधि कहानियों में भी सा$फ देखा जा सकता है। इसमें एक तर$फ उन्होंने ‘जनाज़ा’, ‘युद्ध’, ‘जली हुई रस्सी’ सरीखी रचनाओं के ज़रिये, विभाजन के बाद से अपने में बन्द मुस्लिम समाज के बहुत सारे डर, असमंजस और विरोधाभास हमारे सामने रखे हैं, तो दूसरी ओर ‘जहाँपनाह जंगल’ जैसी दुनिया उद्घाटित की है और ‘परस्त्रीगमन’ जैसा नज़रिया पेश किया है। उनकी कहानियों में हमें अपने भीतर की वह दबी हुई ची$ख सुनाई पड़ती है, जिसे हम रोज़ मुल्तवी करते चलते थे। साथ ही, उनकी दूरबीनी नज़र के सामने हम अपने कार्यकलापों को बौना, br>व्यर्थ और क्षणभंगुर होता हुआ भी पाते हैं। संक्षेप में, उनके पाठकों को कहीं छुटकारा नहीं है—हर हालत में वे पात्रों की नियति के सहभोगी हैं—उसमें विद्रूप हो, व्यंग्य हो या कभी न भुलाया जानेवाला अपमान। शानी के रचना-संसार से अपरिचित पाठकों के लिए यह संकलन य$कीनन प्रतिनिधि सिद्ध होगा।.

Author Shani
Language Hindi
Publisher Rajkamal Prakashan
Isbn 13 9789388183833
Pages 159
Binding Hardcover
Stock TRUE
Brand Rajkamal Prakashan