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9789388211512 6422bdbcd6b8b60283313e15 Prayagraj Aur Kumbh https://www.bookishsanta.com/s/63fe03d26a1181c480898883/6422bdbdd6b8b60283313e30/book-rajkamal-prakashan-9789388211512-19166695129254.jpg
प्रयागराज को तीर्थराज कहा गया है । यह भारत का सर्वप्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र होने के साथ ही भारतीय सात्विकता का सर्वोत्तम प्रतीक भी है । यह हिन्दू-आस्था का एक महान केन्द्र तो है ही, यह हमारे देश की धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का केन्द्रबिन्दु भी है । प्रयागराज के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन मत्स्य, पद्म और कूर्म पुराण के कई अध्यायों में मिलता है । कुम्भ के दौरान संगम तीर्थ पर एक स्नान-दिवस पर भक्तिभाव से कई बार इतने लोग जमा हो जाते हैं कि उनकी संख्या दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक होती है । उन श्रद्धालुओं को कभी कोई निमन्त्रण नहीं देता, वे श्रद्धा और भक्ति की एक अदृश्य डोर में बँधकर वहॉ खिंचे चले आते हैं । हमारी सनातन सस्कृति का यह चुम्बकीय आकर्षण अनादिकाल से यथावत बना हुआ है । श्रद्धा और आस्था का यह आवेग सदियों से चली आ रही हमारी परम्परा का हिस्सा है । यह परम्परा हमें अपनी मूल संस्कृति से जोडे रखने के साथ ही सांस्कृतिक एकीकरण का पथ भी प्रशस्त करती है । स्वाभाविक रूप से प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास के बारे में जानना-समझना एक सुखद अनुभूति है । बहरहाल, अभिलेखीय और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास को इस पुस्तक में बहुत ही सरस ढंग से प्रस्तुत किया गया है । इसमें प्रामाणिकता और रोचकता का मणि-कांचन संयोग है । यह पुस्तक हमारे देश के सांस्कृतिक वैभव की एक अभिनव गाथा लेकर आयी है ।.

9789388211512
in stock INR 480
Rajkamal Prakashan
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प्रयागराज को तीर्थराज कहा गया है । यह भारत का सर्वप्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र होने के साथ ही भारतीय सात्विकता का सर्वोत्तम प्रतीक भी है । यह हिन्दू-आस्था का एक महान केन्द्र तो है ही, यह हमारे देश की धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का केन्द्रबिन्दु भी है । प्रयागराज के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन मत्स्य, पद्म और कूर्म पुराण के कई अध्यायों में मिलता है । कुम्भ के दौरान संगम तीर्थ पर एक स्नान-दिवस पर भक्तिभाव से कई बार इतने लोग जमा हो जाते हैं कि उनकी संख्या दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक होती है । उन श्रद्धालुओं को कभी कोई निमन्त्रण नहीं देता, वे श्रद्धा और भक्ति की एक अदृश्य डोर में बँधकर वहॉ खिंचे चले आते हैं । हमारी सनातन सस्कृति का यह चुम्बकीय आकर्षण अनादिकाल से यथावत बना हुआ है । श्रद्धा और आस्था का यह आवेग सदियों से चली आ रही हमारी परम्परा का हिस्सा है । यह परम्परा हमें अपनी मूल संस्कृति से जोडे रखने के साथ ही सांस्कृतिक एकीकरण का पथ भी प्रशस्त करती है । स्वाभाविक रूप से प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास के बारे में जानना-समझना एक सुखद अनुभूति है । बहरहाल, अभिलेखीय और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास को इस पुस्तक में बहुत ही सरस ढंग से प्रस्तुत किया गया है । इसमें प्रामाणिकता और रोचकता का मणि-कांचन संयोग है । यह पुस्तक हमारे देश के सांस्कृतिक वैभव की एक अभिनव गाथा लेकर आयी है ।.

Author KumarNirmalendu
Language Hindi
Publisher Lokbharti Prakashan
Isbn 13 9789388211512
Pages 261
Binding Hardcover
Stock TRUE
Brand Rajkamal Prakashan