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Nirvasit

(Paperback Edition)

by IlachandraJoshi
Original price Rs. 175.00
Current price Rs. 140.00


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प्रस्तुत उपन्यास की कथा का आरम्भ उस समय से होता है जब द्वितीय महायुद्ध अपनी प्रारम्भिक अवस्था में था और उसकी छाया भारत में पूरी तरह से नहीं पडी थी । तब मध्यवर्गीय समाज के जीवन से रोमान्स की रंगीनी एकदम उठ नहीं गयी थी । इसमें सन्देह नहीं कि उस रंगीनी को युद्धजनित प्रतिक्रिया की विभीषिका का अस्पष्ट आभास किंचित् म्लान करने लगा था, पर अभी उस प्लान छायाभास ने सघन रूप धारण नहीं क्रिया था । एक ओर मध्यवर्गीय समाज अभी तक उसी युग की भावनाओँ, संस्कारों और मान्यताओं से बँधा हुआ था जब प्रथम महायुद्धजनित प्रतिक्रियाओं की पूर्ण समाप्ति के बाद प्रतिदिन के जीवन की साधारण सुख-सुविधाओं में एक प्रकार की ऊपरी स्थिरता-सी मालूम होने लगी थी, और यद्यपि समाज के भीतर-ही-भीतर स्वयं उसके अज्ञात मे-आग निरन्तर धधकती चली जा रही थी । कहानी जब द्वितीय स्थिति पर पहुँचती है, तब एक ओर सन् बयालीस के अगस्त आन्दोलन का दमनचक्रपूर्ण सघन वातावरण, भारतीय आकाश को भाराक्रान्त किये हुए था । दूसरी ओर महायुद्ध की प्रतिक्रिया का परिपूर्ण प्रक्रोप पूरे प्रवेग से देश की जनता के ऊपर टूट पडा था । केवल पूँजीपति और जमींदार वर्ग को छोड़कर और सभी वर्ग इन तो पाटों के बीच में बुरी तरह पिसने लगे थे । उपन्यास की तीसरी और अन्तिम स्थिति तब आती है जब द्वितीय महायुद्ध तो समाप्त हो जाता है, किन्तु समाप्ति के साथ ही अणु-बम के आविष्कार द्वारा तृतीय महायुद्ध के छायापात की सूचना भी दे जाता है । उपन्यास के नायक का जीवन उन तीनों परिस्थितियों से होकर गुजरता है । उन तीनों परिस्थितियों में, अपने संघर्षमय जीवन के बीच में, वह किन-किन और किस प्रकार के पात्रों तया यात्रियों के सम्पर्क में आता है, जीवन के किन जटिल-जाल-संकुल पथों से होकर विचरण करता है, किन-किन धटना-चक्रों का सामना उसे करना पड़ता है और उनकी क्या-क्या और कैसी प्रतिक्रियाएँ उसके भीतर होती है, इन्हीं सब बातों का चित्रण करने का प्रयत्न इस उपन्यास में किया है ।.


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More Information:
Publisher: Lokbharti Prakashan
Language: Hindi
Binding: Paperback
Pages: 304
ISBN: 9789352211319

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