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Pratinidhi Shairy : Akbar Allahabadi

(Paperback Edition)

by AkbarAllahabadi
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1851 की जंगे–आजादी में हिंदस्तानियों की हार के बाद उर्दू अदब में शुरू होने वाले रेनासाँ में ‘अकबर’ इलाहाबादी का नाम सफे–अव्वल के शायरों में गिना जाता है । धर्म पर आधारित इस रेनासाँ की सारी विशेषताएँ ‘अकबर’ के यहाँ पूरी स्पष्टता के साथ देखी जा सकती हैं । ‘अकबर’ के कलाम की एक विशेषता और भी है । उन्होंने अपनी शायरी की शुरुआत संजीदा रवायती शायरी के साथ की थी । वही गुलो–बुलबुल, वही साग“रो–मीना, वही शीरीं–फ’रहाद, वही शमा और परवाना रवायती शायरी के सारे प्रतीक ‘अकबर’ की शुरुआती शायरी में नज“र आते हैं । लेकिन अकबर इसी रवायत पर कायम रहे होते तो तय है कि वे मामूली दर्जे के सैकड़ों शायरों में बस एक होते । लेकिन खुशनसीबी कि ऐसा नहीं हुआ । जल्द ही अकबर ने अपनी एक अलग राह बना ली और वे हास्य–व्यंग्य के पहले प्रमुख शायर के रूप में जल्वागर हुए । यूँ तो जाफ’र, मीर, सौदा, गालिब और दूसरे शायरों के यहाँ हास्य और व्यंग्य की सुन्दर छटाएँ देखने को मिलती हैं, लेकिन इनमें से किसी को भी बाकायदा हास्य–व्यंग्य का शायर नहीं कहा जा सकता । ये ‘अकबर’ थे जिन्होंने उर्दू शायरी में अपनी बात कहने के लिए हास्य–व्यंग्य का सहारा लिया और एक ऐसी नई रवायत की बुनियाद डाली जो आज तक फल–फूल रही है । विचारधारा के स्तर पर देखें तो पश्चिमी ज्ञान–विज्ञान और पश्चिमी सभ्यता का जितना भारी विरोध ‘अकबर’ के यहाँ दिखाई देता है उतना किसी और शायर के यहाँ नहीं दिखाई देता । इसी तरह ‘अकबर’ धार्मिक और सामाजिक सुधार के भी विरोधी थे । बदलते हुए हालात में ‘अकबर’ की शिकस्त लाज“मी थी और कहीं हास्य के साथ और कहीं दुख के साथ उन्होंने अपनी इस शिकस्त का इज“हार भी किया है । लेकिन इस नकारात्मक पहलू के अन्दर जो सकारात्मक तत्त्व मौजूद हैं, सावधानी के साथ उनकी निशानदही किए बिना ‘अकबर’ के साथ इंसाफ’ करना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है ।


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More Information:
Publisher: Radhakrishna Prakashan
Language: Hindi
Binding: Paperback
Pages: 183
ISBN: 8171197140

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